एक महात्मा जो 100 साल बाद के खतरे को भांप चुका था

महात्मा गाँधी जी की 150वी जयंती पर क्लाइमेट एक्टिविस्ट लोकेश भिवानी का लेख

लोकेश भिवानी
पर्यावरण कार्यकर्ता ,संस्थापक , स्टैंड विद नेचर
Climate Activist Eccotarian

पृथ्वी के पास सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हर किसी के लालच को नहीं” ये कथन गांधी जी ने कहा था व ऐसे अनेको बातें उन्होंने अपने भाषणों में कही जो उनके पर्यावरण प्रेम को स्प्ष्ट करती है।
आज हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 150वी जयंती मना रहे है , मैं पर्यावरण कार्यकर्ता होने के नाते उनके इस जन्मदिन को पर्यावरण संरक्षण को समर्पित कर रहा हूँ।
आज दुनियाभर में पर्यावरण के अनेको जनांदोलन चल रहे है जो मूल रूप से पूंजीवाद व्यवस्था की आलोचना कर रहें है , ऊपर लिखा गाँधी जी का कथन इन आंदोलनों को गाँधी जी से जोड़ने का काम करता है ।
आजादी के बाद देशभर में हुए प्रमुख पर्यावरण आंदोलनों को मुख्य बात रही कि ज्यादातर आंदोलनों ने गांधीवादी तरीके अपनाए जैसे कि – सविनय अवज्ञा, तटीय रेत में खुद को दफना लेना, जल सत्याग्रह, लंबी पैदल यात्रा, भूख हड़ताल ।
पूंजीवाद द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारणवश इस तरह के आंदोलनों को तेजी मिली ।
पश्चिम के देशों में इस तरह के जनांदोलनों को मध्यम वर्ग संचालित करता है , लेकिन भारत में गरीब लोग इन आंदोलनों के अगुवा , पुरोधा होते है , वो अपने अतित्व की लड़ाई लड़ रहे होते है ,हालांकि फिर इसमे सभी वर्ग के लोग शामिल हो जाते है ।
अतः हम कह सकतें है कि देश के पर्यावरण आंदोलनों में गांधीवादी विचारधारा समाहित है ।
उस दौर में ही महात्मा गांधी ने स्थिरता और सतत विकास के लिए लगातार बढ़ती इच्छाओं और जरूरतों के अधीन आधुनिक सभ्यता के खतरों की ओर ध्यान दिलाया था। अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में उन्होने लगातार हो रही खोजों के कारण पैदा हो रहे उत्पादों और सेवाओं को मानवता के लिए खतरा बताते हुए उन्होने वर्तमान सभ्यता को अंतहीन इच्छाओं और वहसी सोच से प्रेरित बताया । उनके अनुसार असली सभ्यता अपने कर्तव्यों का पालन करना और नैतिक और संयमित आचरण करना है। उनका दृष्टिकोण था कि लालच और जुनून पर अंकुश होना चाहिए। इस अर्थ में उनकी पुस्तक हिंद स्वराज टिकाऊ विकास का घोषणापत्र है। जिसमें कहा गया है कि आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता मे ही उसके विनाश के बीज सन्निहित हैं। गाँधी जी ने अपने समय में ही आज के भविष्य को देखते हुए सतत विकास व जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित चिंता व्यक्त करते हुए अपने विचार दिए थे।
गाँधी जी वायु प्रदूषण पर भी खासे चिंतित थे उन्होंने कहा कि शरीर को तीन प्रकार के प्राकृतिक पोषण की आवश्यकता होती है- हवा, पानी और भोजन। लेकिन साफ हवा सबसे अधिक आवश्यक है। ये चिंता का विषय है कि हमें इसके लिए कीमत देनी पड़ेगी ।
हिंसा व नफ़रत पर दुनिया को अहिंसा का रास्ता दिखाते गाँधी में जब प्राकृतिक संसाधनों के हनन व उनके सही प्रयोग पर लोगो को दिशा देना उन्हें पर्यावरण कार्यकर्ताओ के लिए भी आदर्श बनाता है , देश के बड़े पर्यावरण आंदोलनों के नेताओ ने भी स्पष्ठ कहा है कि वो गाँधी के विचारों से प्रभावित रहे।
कुछ लोग गाँधी को पर्यावरणविद बताने के इस विचार से असहमत हो सकतें है । उस समय की परिस्थितियों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण प्राथमिक मुद्दा नही रही यह कभी विचारों का केंद्र बिंदु नही बन पाया ,लेकिन उस दौर में भी जब गाँधी जी ने खतरों को भांपते हुए इन विषयों पर अपने विचार दिए जो उन्हें पर्यावरण संरक्षण के अगुवा सिद्ध करते है।
गाँधी जी ने कहा हैं कि “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दें”। वहीं आज हम इसका अभाव पाते हैं क्योंकि आज लोभ, लाभ और भौतिक सुख ही व्यक्ति के लिए सर्वोच्च है। पूंजीवाद व्यक्ति की इन्हीं इच्छाओं व लालसाओं का परिणाम हैं। बापू ने आधुनिक सभ्यता को अनैतिक व शैतानी सभ्यता कहा और लिखा- “पाश्विक भूख को बढ़ाने की और उसकी स्ंतुष्टि के लिए हम अंधाधुंध तरीके से भागदौड़ कर रहें है ,जिसमे नैतिकता का पतन हो रहा है ,अगर आधुनिक सभ्यता यहीं हैं , तो मैं इसे शैतानी ही कहूंगा” प्रकृति पर स्वामितत्व व अधिकार की लालसा का परिणाम गांधी जानते थे इसी कारण उन्होंने आधुनिक भौतिक सुख की नीतियों का विरोध किया है।
बापू ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के विभिन्न कारकों और उसे संरक्षित रखने के विभिन्न उपायों पर अपने विचार रखे हैं. अपने लेख ‘स्वास्थ्य की कुंजी में उन्होंने स्वच्छ वायु पर अपने विचार व्यक्त किए हैं. इसमें उन्होंने कहा है कि तीन प्रकार के प्राकृतिक पोषण की आवश्यकता होती है-हवा, पानी और भोजन, लेकिन स्वच्छ वायु सबसे आवश्यक है.
गांधीजी ने अपने चिंतन में पर्यावरण शब्द का सीधा जिक्र नहीं किया , लेकिन उनके चिंतन में पर्यावरण की चिंता हमेशा दिखाई दी है । अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने मशीनों का विरोध किया है और हाथ के श्रम को महत्व दिया है. मशीनीकरण के विरोध के जरिए उन्होंने लोगों को समझाया है कि अनावश्यक मशीनीकरण पर्यावरण को हानि पहुंचाता है, इसलिए हाथ के हुनर को महत्व देना चाहिए।गांधीजी ने भारतवासियों का परिचय चरखे से करवाया. लोगों को चरखे से सूत कातने व उससे बुने वस्त्र पहनने को पहने के लिए प्रेरित किया. इसके पीछे उनका उद्देश्य स्वदेशी के प्रति अलख जगाना तो था ही, साथ ही कपड़ा मिलों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों और कचरे को कम करना भी था. गांधी जी प्रकृति प्रेमी थे और चाहते थे कि इस सुंदर प्रकृति को अपने स्वार्थ हेतु मानव खराब ना करे ।
अब जरूरत है कि गाँधी जी की 150वे जयंती पर हम संकल्प लें कि गाँधी को मानने के साथ हम गाँधी की भी मानेंगे व पर्यावरण संरक्षण हेतु व जलवायु परिवर्तन को रोकने में अपनी ईमानदार भागीदारी सुनिश्चित करेंगे ।

– लोकेश भिवानी
पर्यावरण कार्यकर्ता ,
संस्थापक , स्टैंड विद नेचर
Climate Activist
Eccotarian